रविवार, 24 फरवरी 2008
कैमरे पर गुनाहगार या कैमरे वाले...?
कल घर पहुंची तो तमाम चैनलों में बिहार की एक खबर चल रही थी। पुलिस कस्टडी से एक आरोपी को लोगों की भीड़ ने पहले तो खींचा। फिर इतना पीटा कि उसने दम तोड़ दिया। घटना वाकई शर्मनाक है। लेकिन उससे भी शर्मनाक है टीवी कैमरामैन और रिपोटर्स का रवैया। एक चैनल में स्लग चल रहा था- कैमरे पर गुनाहगार। वॉयस ओवर बता रहा था कि गुनाहगार नंबर एक- जिसने उसे खींचा और पीटा। गुनाहगार नंबर दो-----गुनाहगार नंबर तीन----इस लिस्ट में मूकदर्शक बने पुलिस के सिपाहियों का नाम भी था। लेकिन गुनाहगारों की लिस्ट से टीवी कैमरामैन और रिपोर्टर का नाम कहीं नहीं था। वाकई में कैमरामैन ने क्या काम किया था। हर एंगल से उस आरोपी को पीटते हुए शॉट लिए थे। लेकिन क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी उसे बचाने की? सबके अपने-अपने विचार हो सकते हैं। लेकिन वह देखकर मुझे तो यह लगा कि शुक्र है मुंबई में न्यू ईयर की रात जब लड़कियों से छेड़छाड़ हो रही थी तो वहां अखबार के कैमरामैन और रिपोर्टर थे, जिन्होंने तुंरत पुलिस को सूचित कर दिया। अगर वहां भी ये टीवी वाले होते तो शायद दूसरे दिन चैनल में दिख रहा होता- पहली बार न्यूज चैनल में...एक्सक्लूसिव....लाइव....रेप.....। यह लिखते हुए मुझे खुद काफी बुरा लग रहा है क्योंकि मैं खुद चैनल में काम कर चुकी हूं। लेकिन हकीकत कड़वी ही होती है। मेरा मतलब यह भी कतई नहीं है कि वहां काम करने वाले सब एक ही ढर्रे के होते हैं। लेकिन जो दिख रहा है उसे नकारा नहीं जा सकता। इस हिसाब से तो कैमरे पर गुनाहगार टाइटल की जगह होना चाहिए था- कैमरे वाले गुनाहगार
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
5 टिप्पणियाँ:
बधाई हो आप को कम से कम आप ने ये बोला तो यहाँ तो कोई बोलना ही नहीं चाहता है
aaj pahalee baar aapke blog par aayee hoo, achchaa laga
पुनम जी ,मेरा मनना हे,केमरे वाले भीएक तरह से हत्या के जिम्मेदार हे,उस केमरे की वजह से ही कई गिदड भी शेर बन गये होगे, ओर वो गरीब चोर (श्याद उसने पेट भरने के) लिये छोटी मोटी चोरी की होगी,अपनी जान से गया,लेकिन इन टी बी बालो को तो खबर चहिये,हर एगंल से सो मिल गई,जनता जाये भाड मे
पूनम जी टीवी पर दृश्य देखकर इस तरह आप का आक्रोश टीवी पत्रकारिता और कैमरे वाले पर फूटा कि आप एक लेख को मजबूर हो गईं। उस को देख सुनकर ऐसा ही आक्रोश बहुतों को उस भीड़ की घिनौनी हरकत पर भी आया होगा।और यही वो बिंदु है जहां टीआरपी खेल के बावजूद पत्रकारिता का मकसद भी हासिल हो जाता है। रही बात मुंबई में न्यू इयर के दिन वारदात की तो अखबार नवीशों ने भी उस दिन फोटो ही उतारी थी...और ये ड्यूटी कितनी कामयाब रही वो सराहना तो आप भी कर रहीं हैं।जज्बात की रौ में बहना या फिर काबू में रहते हुए मकसद हासिल करना अभी भी लंबी बहस का मुद्दा है।...भावुकता काबिले तारीफ है।बधाई।
पूनमजी
आप शायद भूल गई कि कुछ सालों पहले एक चैनल के रिपोर्टर के उकसाने पर सहकारी मडली के बाहर अपने बकाया पैसों के लिये धरना दे रहे शख्स (शायद मनोज नाम था) ने खुद को अग लगा ली थी। उस बेचारे तड़प तड़प कर मौत हो गई ये रिपोर्टर उस दृश्य को शूट करने में व्यस्त थे बचाने में नहीं।
और हाँ क्या आपको वे बेचारे नकली शत्रुघ्न सिन्हा याद है? जिन्हें एक चैनल ने नकली पहचान पत्र के जरिये संसद भवन के अहाते में पहुंचा दिया था और बाद में जब वह पकड़े गये तो आज तक उनकी सुध नहीं ली।
एक टिप्पणी भेजें